Page 37 - RISE_NOVEMBER-2021
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TEACHER’S CORNER







                                            अव्यि भाव !!!!!!!!


                                                 अव्यि भाव !!!!!!!!

                                                                            े
                                        जानती नहीों तम्ह पर तम आ जात हय
                                                                 ु
                                                          ें
                                                       ु
                                                                                   े
                                    िब्यों का पहन कर जामा, कलम स्याही स
                                        कर श्गार  काग  पर छप जात हय ..
                                                                          े
                                              ृों
                                           े
                                  ओ ! मर अव्यि भाव तम कशवता बन जात हय|
                                                             ु
                                         े
                                                                                 े
                                      े
                                                                            ें
                                                             ु
                               ओ! मरी अव्यि कशवता तम क्यों मन म गहराती हय
                                         ू
                                  भाव पररत हयकर भी , भाव रशहत हय जाती हय |
                                            ूँ
                               जब रात  अिरा छाता ह, जग सारा यह जब सयता ह
                                              े
                                                                                        ै
                                                          ै
                                                                       े
                                                         ै
                                                                                       ै
                                                ें
                                 मीि सपनयों म सयता ह, शफर मन मरा क्यों रयता ह
                                     े
                                          ूँ
                                                               ु
                                                                               े
                                      े
                                              े
                              तब दब पाव स  आकर तम मझकय दस्तक द जाती हय
                                                          ु
                                                                ू
                                                 ु
                                  कछ मीिी , कछ  कडवी, टट फट स िब् शलए
                                                                          े
                                   ु
                                                                       े
                                                                  े
                                                                     ू
                                                          े
                                                               ें
                                                     े
                                                             े
                                                ु
                                            ु
                                          तम मझस अकल म बशतयाती हय
                              मन स्त्ाव सी बहकर तम, पल भर कय मन तरशगत कर
                                                       ु
                                                                                ों
                                           शफर पन: मक हय जाती हय ....
                                                   ु
                                                        ू
                                                                      ू
                                  ओ ! मरी अव्यि कशवता भाव पररत हयकर भी
                                         े
                                                ु
                                          क्यों तम भाव रशहत हय जाती हय |
                                                                  े
                                   कई बार तय भावयों न, गला मरा अवरुद्ध शकया
                                                         े
                                                                               े
                                   कभी शझझयड़ा, कभी मरयड़ा, कभी तान शमल
                                                                                    े
                                  कभी कयसा , पाषार् हृदय हयन का आरयप लगा
                                                                    े
                                                            ु
                                                                             े
                                                                े
                                         पर कशवता बन तमन ओ! भाव मर
                                                                              े
                                                          े
                                                        े
                                              मन कय मर  स्पशदत शकया
                                                               ों
                                                                       े
                                                               ु
                                           जब शनकल नहीों  तम पात तय म        ैं
                                                             ों
                                         ों
                                                                                ूँ
                                      स्पशदत हयकर भी ,स्पदहीन हय जाती ह |
                                                            ें
                                                       े
                                                                                     ूँ
                                   िब् खशचत इस मल म, एकल ही रह जाती ह
                                                         े
                                                                                   ूँ
                                  भाव पररत हयकर भी , भाव रशहत हय जाती ह |
                                          ू
                                                               े
                                म.... मर अव्यि भाव .... मरी अव्यि कशवता ....
                                        े
                                         े
                                  ैं



                                                             अचला शर्ा
                                                                       ा
                                                             ह दी हिभाग
                                                               िं





                                                                                                                 37
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