Page 24 - KV Pragati Vihar (Emagazine)
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द्िारा: अज्ञात                                  आहदत्य, सातिीं अ

                        एक नया सवेरा                                               पधथक


                     रात ढली और नींद खुली
                       एक नया सवेरा आया,                               रुकता है तू आज पधथक क्यूाँ,

                    अलफाज़ नए और गीत नए,                               झुकता है तू आज पधथक क्यूाँ .

                     पर राग नया क्रफर छाया,
                                                                           दूर वहााँ, उस छोटी पर
                      नाम नया अंदाज नया,
                                                                         मससक रही तेरी अमभलाषा.
                      पर परचम वहीँ फहराया,

                     सरहद वही और खून वही,                              आहत है तू आज पधथक क्यूाँ,

                    पर इस बार अमन है छाया,                              उठता है तू आज नहीं क्यूाँ .
                    रात ढली और नींद  खुली,                               तुझे पहाँचना होगा उस तक
                                                                                 ु
                       एक नया सवेरा छाया                                   पूरी करने अपनी आशा.

                    इस पार वही, उस पार वही,

                   क्रफर क्यों पवश्वास डगमगाया                        दहम्मत कर तू आज पधथक यूाँ,
                     तुम भी वही, मै भी वही,                           पररणत कर तू आज पधथक यूाँ,

                   पर दहंदुस्तान नवल कहलाया,                             तू खड्ग उठा पवित कर दे

                     रात ढली और नींद खुली                              खंडडत कर तू मन की तनराशा.
                      एक नया सवेरा आया I
                                                                     क्रफर दमशात होगा आज पधथक यूाँ,
                                          मुस्कान, XII A
                                                                   अमभनव अनुभव सा आज पधथक यूाँ,
               खरबूजे का मौसम आया
                                                                        दृग खोल हाँसेगी स्वखणाम उषा
                 पपकतनक करनेका मन आया !
                                                                         छाँट जायेगा सघन क ु हासा.
                    मोटर में सबको बैठाया !!
                                                                       रुकना मत तू आज पधथक यूाँ,
                   पहाँच गए सब नदी क्रकनारे !
                      ु
                                                                       झुकना मत तू आज पधथक यूाँ,
                     खरबूजे के  खेत तनराले !!

                    ककड़ी,खीरा और खरबूजे !                               बढ़ चल उस ऊाँ ची चोटी तक,
                                                                      आमलंगन कर अपनी अमभलाषा.
                     कच्चे–पक्के  थे खरबूजे !!

                    प्राची, क्रकट्टू और प्रांजल !

                    करते थे जंगल में मंगल !!                                                       प्रीतत यादव

                    लो मैं पेटी में भर लाया !                                                  प्राथममक मशक्षिका

                   खरबूजों का मौसम आया !!

                   देख पेड़ की शीतल छाया !

                   हमने आसन वहााँ बबछाया !!
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