Page 36 - karmyogi
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27 अगस्त 1947 र्ें,
         ककि पता था िर्य क िक्र का
                े
                                             े
                                                                                                                                          अतर्मि क चित्कारों ि ,
                                                                                                                                                                              े
                                                                                                                                                          े
                                                                                                                                             ं
                 अनत दयिीय स्वऱूप,
                                                                                                                                           अिह्य िैलाब उिा था।
          हृदय पवदीणम करता िआ काल
                                            ु
                                                                                                                                                                           े
                िब बि गया था क्र ू र।                                                                                                         िब किा था उिि --
                                                                                                                                                                      ं
                                                                                                                                                  ं
                                                                                                                                                                        े
                                                                                                                                                                े
          िलवाि पररवार क पूणम िद्र ,                                                                                                            दगाइयों क दग र्ें
                                       े
                                                    ं
                                                                                                                                         आित िआ र्रा ब्रह्र्दत्त,
                                                                                                                                                                े
                                                                                                                                                      ु
                                                                                                                                                ू
                                                ं
           ब्रह्र्दत्त      की िीवि िहद्रका
                                                                                                                                     औरों की प्राण रक्षा करते करते
           पर छा गई निर्मर् अर्ावस्या,
                                                                                                                                                                  े
                                                                                                                                            ििीद िआ र्रा अग्रि।
                                                                                                                                                        ु
              िल रिी थी िब चगरधारी
                                                                                                                                          िंपूणम धरा कांप उिी थी,
                                         े
                 और िरदार पटल की
                                                                                                                                    और धरािायी िआ था चगरधारी,
                                                                                                                                                             ु
              गंभीर पविारणीय ििाम,
                                                                                                                                  सर्लती थी जििि िबको िांत्विा,
                                                                                                                                                               े
                                         े
       तभी किीं चगरधारी क अिुि पुि
                                                                                                                                                                               े
                                                                                                                                                                े
      सिवदत्त का ह्रदय चित्कार उिा था,                                                                                                      आि उिी क हृदय ि,
                                                                                                                                           निझमररणी िी बि रिी थी
                                                                                                                                                                   े
                                                                                                                                                   अपवरल वदिा।
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