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"सिक्षापवद का पुिरुत्थाि"
झेला ििीं जिन्िोंि े िीख रिी थी, स्वप्ि र्ें भी
पवभािि की भयाविता, लि - लुिाि
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उिक सलए थी छपवयां हदख रिी थी,
यि अिंभव पररकल्पिा, दगों र्ें चित्कार रिी थी,
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व तया िर्झे र्ािवता को, स्वििों की पीडा,
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ककतिी पविसलत कर कछ िदा क सलए छोड िल थ,
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रिी रतत रजित चििों िो रि गए
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की र्र्मभदी असभव्यंििा, उिक रुदि क्रदि र्ें,
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इर्ारतें पवराि खंडिरों दुभाग्य की
की तरि िो रिी थी क्रीडा।