Page 42 - karmyogi
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"सिक्षापवद का पुिरुत्थाि"








               झेला ििीं जिन्िोंि                  े                                                                              िीख रिी थी, स्वप्ि र्ें भी


           पवभािि की भयाविता,                                                                                                                    लि - लुिाि
                                                                                                                                                      ु

                           े
                  उिक सलए थी                                                                                                            छपवयां हदख रिी थी,
          यि अिंभव पररकल्पिा,                                                                                                        दगों र्ें चित्कार रिी थी,
                                                                                                                                       ं

       व तया िर्झे र्ािवता को,                                                                                                               स्वििों की पीडा,
          े
             ककतिी पविसलत कर                                                                                                  कछ िदा क सलए छोड िल थ,
                                                                                                                                                     े
                                                                                                                                                                                         े
                                                                                                                                                                                   े
                                                                                                                                 ु
              रिी रतत रजित चििों                                                                                                                    िो रि गए
                                   ं
                                                                                                                                                                   ं
          की र्र्मभदी असभव्यंििा,                                                                                                        उिक रुदि क्रदि र्ें,
                            े
                                                                                                                                                  े
                                                                                                                                                           म
            इर्ारतें पवराि खंडिरों                                                                                                                 दुभाग्य की
                         की तरि                                                                                                              िो रिी थी क्रीडा।
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