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"सिक्षापवद का पुिरुत्थाि"
िरणाचथमयों क पुिवाि
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पर था िंकट खडा,
आिार ,व्यविाय और आय
पर था िर्य का खंिर िडा ।
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िीवि अंनतर् र्ूल्याकि
की ओर था बढ़ रिा,
िर्ाि क प्रनत पुिवाि ििी ििि था,
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चगरधारी की प्रनतबद्धता का, िभी ओर
कहिि प्रश्ि पि था रि रिा। िांप्रदानयक अिांनत का किर था,
िोता जितिा
े
बाधाओं को पार करि का प्रण,
बढ़ता उतिा िी
निरतर दगों का आक्रर्ण,
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